
राजेश कुमार भगताणी सिनेमा में तथ्य और कल्पना का मेल नया नहीं है, लेकिन जब कोई फिल्म भारतीय सशस्त्र बलों को सम्मान देने का दावा करती है, तब उससे ज़्यादा ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है। बॉर्डर 2 इसी कसौटी पर खुद को कमजोर साबित करती दिखती है। बड़े बजट और बड़े नामों के बावजूद यह फिल्म न तो वैसी प्रामाणिकता ला पाती है और न ही वैसा भावनात्मक असर, जिसकी उम्मीद दर्शकों को थी। रिसर्च की कमी ने खोली फिल्म की पोल फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी अधूरी तैयारी है। सैन्य अभियानों और विभिन्न सेनाओं के आपसी तालमेल को बेहद सतही ढंग से पेश किया गया है। कई दृश्य ऐसे हैं, जो वास्तविकता से कटे हुए लगते हैं। खासकर हवाई एक्शन सीन कमजोर CGI के कारण फिल्म की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाते हैं। जहां ऐसे दृश्य रोमांच बढ़ाने चाहिए थे, वहीं वे दर्शक को कहानी से बाहर कर देते हैं। नौसेना का चित्रण: गंभीर विषय, हल्का ट्रीटमेंट भारतीय नौसेना का चित्रण फिल्म की एक बड़ी चूक के रूप में सामने आता है। एक अनुशासित और रणनीतिक बल को केवल कुछ चमकदार दृश्यों तक सीमित कर दिया गया है। युद्धपोतों और पनडुब्बियों की CGI इतनी बनावटी लगती है कि तकनीक के इस दौर में यह लापरवाही समझ से परे है। जब फिल्मकारों के पास आधुनिक टूल्स, AI और विशेषज्ञों तक पहुँच है, तब ऐसे शॉर्टकट सवाल खड़े करते हैं। तकनीकी नहीं, सोच की नाकामी यह महज़ तकनीकी खामी नहीं है, बल्कि दृष्टिकोण की विफलता है। सिनेमा समाज की समझ को प्रभावित करता है, और जब सैन्य बलों को गलत या अधूरा दिखाया जाता है, तो उसका असर दर्शकों की सोच पर भी पड़ता है। आज जब पूर्व सैनिक, सैन्य इतिहासकार और आधिकारिक रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध हैं, तब रिसर्च की अनदेखी को माफ़ नहीं किया जा सकता। बॉक्स ऑफिस पर स्थिति: हाइप ज़्यादा, पकड़ कम बॉक्स ऑफिस की बात करें तो बॉर्डर 2 ने शुरुआत ठीक-ठाक की। देशभक्ति के विषय और मूल बॉर्डर की लोकप्रियता ने शुरुआती दिनों में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा। लेकिन जैसे-जैसे दर्शकों की प्रतिक्रिया सामने आई, फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ती गई। करीब 250 करोड़ रुपये के भारी बजट में बनी यह फिल्म फिलहाल अपनी लागत निकालने की जद्दोजहद में नज़र आती है। शुरुआती कमाई के बावजूद यह कहना मुश्किल है कि फिल्म साफ़ तौर पर हिट की श्रेणी में जाएगी। मौजूदा रुझान बताते हैं कि बॉर्डर 2 के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुनाफ़ा कमाना नहीं, बल्कि लागत वसूल कर पाना है। तुलना जो असहज करती है बॉर्डर 2 को लेकर दर्शकों को उम्मीद थी कि यह फिल्म हॉलीवुड अभिनेता टॉम क्रूज की टॉप गन: मैवरिक का मुकाबला करने में सफल होगी। टॉम क्रूज ने 36 साल के अन्तराल के बाद अपनी कल्ट क्लासिक टॉप गन का सीक्वल बनाया जो ब्लॉकबस्टर रहा था। टॉप गन मैविरक को अक्सर इसलिए उदाहरण के तौर पर रखा जाता है क्योंकि उसने यह समझा कि किसी कल्ट क्लासिक का सीक्वल समय का फायदा उठाने से नहीं, बल्कि समय की जिम्मेदारी उठाने से बनता है। उस फिल्म ने तकनीक से पहले भावनात्मक निरंतरता, तमाशे से पहले प्रामाणिकता और स्टार पावर से पहले विषय के सम्मान को प्राथमिकता दी। मुद्दा यह नहीं था कि दर्शकों को कुछ बड़ा दिखाया जाए, बल्कि यह कि वही भावना दोबारा जगाई जाए, जिसने मूल फिल्म को खास बनाया था। बॉर्डर 2 के पास भी 28 साल का फासला था—इतिहास को समझने, अनुभव से सीखने और कथा को परिपक्व करने का अवसर। लेकिन यह दूरी आत्ममंथन में नहीं बदली। परिणाम यह हुआ कि सीक्वल मूल फिल्म की आत्मा से संवाद करने के बजाय उससे सिर्फ नाम उधार लेता दिखाई देता है। शोर ज़्यादा, संवेदना कम बॉर्डर 2 सबसे ज़्यादा जिस चीज़ में पिछड़ती है, वह है उसकी आत्मा। मूल बॉर्डर चिट्ठियों, खामोशी, डर और परिवार की पीड़ा को जगह देती थी। वहीं सीक्वल ज़्यादा शोर, ज़्यादा एक्शन और कम संवेदना में उलझा हुआ है। इसी वजह से वह भावनात्मक जुड़ाव पैदा नहीं कर पाती, जो पहली फिल्म की पहचान था।